स्थान: वृंदावन, बांके बिहारी मंदिर
वृंदावन… जिसे दुनिया ‘प्रेम की नगरी’ कहती है, जहाँ हवाओं में सिर्फ ‘राधे-राधे’ घुलता है। लेकिन ठहरिये! क्या यह ‘प्रेम’ सिर्फ किताबों और भजनों तक सीमित रह गया है?
मंगलवार शाम, जब पूरा वृंदावन बांके बिहारी के प्राकट्योत्सव (विहार पंचमी) के उल्लास में डूबा था, ठीक उसी वक्त मंदिर के अंदर एक ऐसी घटना घटी जिसने इंसानियत और आस्था, दोनों को शर्मसार कर दिया।
कसूर: ‘भाव’ में बहना या ‘VIP’ न होना?
पंजाब के 60 वर्षीय बुजुर्ग राजन अरोड़ा, जो वर्षों से वृंदावन में रहकर ठाकुरजी की भक्ति कर रहे हैं, उनका कसूर सिर्फ इतना था कि भीड़ और भक्ति के आवेग में वे मंदिर के ‘जगमोहन’ की सीढ़ियों पर चढ़ गए।
शायद इस भोले भक्त को पता नहीं था कि कलयुग में भगवान के ‘खास’ दर्शनों के लिए ‘भाव’ से ज्यादा ‘जेब’ का भारी होना जरूरी है। आरोप है कि वहां मौजूद एक ‘सेवायत’ (शब्द पर गौर करें- सेवक) को यह नागवार गुजरा। पहले बुजुर्ग को धक्के मारे गए, और जब उन्होंने अपना चश्मा संभाला, तो उन पर किसी भारी चीज से ताबड़तोड़ वार कर दिए गए।
वो वाक्य, जो पत्थर दिल को भी पिघला दे…
अब उस मंज़र को सोचिये। एक 60 साल का बुजुर्ग, सिर से खून बह रहा है, आंखों में आंसू हैं, लेकिन उसकी आस्था का स्तर देखिये। उसने पुलिस को नहीं पुकारा, उसने मारने वाले को गाली नहीं दी। वह हाथ जोड़कर मारने वाले ‘सेवक’ से ही गिड़गिड़ाया:
“मार तो लिया, अब कम से कम दर्शन तो करा दो…।”
यह सिर्फ एक वाक्य नहीं है, यह उस निश्छल भक्ति की पराकाष्ठा है जिसके लिए शरीर की पीड़ा से बड़ा ठाकुरजी का एक दीदार है। और यह उस व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है, जहाँ ठाकुरजी के सामने ही उनके भक्त की यह दुर्गति हुई।
‘गप्पेबाज़’ के तीखे सवाल:
पुलिस सीसीटीवी खंगाल रही है, जांच चल रही है। लेकिन ‘गप्पेबाज़’ आज धर्मनगरी के ठेकेदारों से आँखों में आँखें डालकर कुछ सवाल पूछना चाहता है:
‘सेवक’ या ‘बाहुबली’? जो हाथ भक्तों को आशीर्वाद देने और ठाकुरजी की सेवा के लिए उठने चाहिए, वो हाथ बुजुर्गों पर लठ्ठ बनकर कैसे बरस सकते हैं? क्या ‘सेवायत’ का मतलब अब ‘मालिक’ हो जाना है?
दर्शन का बाज़ार? क्या बांके बिहारी अब सिर्फ उनके हैं जो ‘वीआईपी’ हैं या चढ़ावा दे सकते हैं? एक आम भक्त, जो सिर्फ आंसुओं का अर्घ्य लेकर आता है, क्या उसकी किस्मत में सिर्फ धक्के और मार है?
संवेदना कहाँ गई? भीड़ तंत्र का बहाना बनाकर भक्तों के साथ जानवरों जैसा सलूक कब तक चलेगा?
निष्कर्ष: आईना देखने का वक्त
यह घटना सिर्फ एक बुजुर्ग के साथ मारपीट नहीं है, यह वृंदावन की उस ‘आत्मा’ पर चोट है जो सबको गले लगाती थी। अगर ठाकुरजी के सामने ही भक्त खून के आंसू रोएगा और उसकी पुकार अनसुनी कर दी जाएगी, तो फिर ‘प्रेम मंदिर’ और ‘व्यापार के अड्डे’ में फर्क क्या रह जाएगा?
सोचियेगा ज़रूर। क्योंकि अगर आज आस्था के केंद्रों पर ‘अहंकार’ जीत गया, तो फिर ‘भाव’ हार जाएगा।
Note from GappeBaaz: हमारा मकसद किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर घुस आई संवेदनहीनता को उजागर करना है। प्रभु बांके बिहारी सबको सद्बुद्धि दें।
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